सावरकर की वीरता कितनी हकीकत, कितना फ़साना

2014 में शपथ लेने के ठीक दो दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में सावरकर के पोट्रेट को फ्लोरल ट्रिब्यूट पेश किए थे।

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सावरकर की वीरता कितनी हकीकत, कितना फ़साना
सावरकर की वीरता कितनी हकीकत, कितना फ़साना

सावरकर की वीरता कितनी हकीकत, कितना फ़साना


आजकल विनायक दामोदर सावरकर की बहुत चर्चा हो रही है। अभी कुछ दिन पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यूनिट ने बगैर परमिशन के सावरकर ,भगत सिंह और सुभाष बोस की मूर्ति कैम्पस में लगा दी थी। उनको ये मूर्तियां यूनिवर्सिटी अथॉरिटीज के कहने पर हटानी पड़ी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस अहम एफिडेविट ऑर्गनाइजेशन के इस विफल इनिशिएटिव को आइसोलेशन में नहीं देखा जा सकता।

2014 में शपथ लेने के ठीक दो दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में सावरकर के पोट्रेट को फ्लोरल ट्रिब्यूट पेश किए थे। ये पोट्रेट सेंट्रल हॉल में बहुत कंट्रोवर्शियल हुई और इसे सांसद में वाजपेयी सरकार ने लगाया था। उनकी सरकार तो सावरकर को भारत रत्न से भी गौरवान्वित करना चाहती थी मगर उस समय के राष्ट्रपति के आर नारायणन ने फाइल वापस भेज दी। मोदी जी ने इस साल भी सावरकर के जन्मदिव्स पर एक लंबा मैसेज ट्वीट किया था। उन्होंने कहा था कि सावरकर शस्त्र और शास्त्र दोनों की उपासना करते थे। मोदीजी ने अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता भी दोहराई जिसमें सावरकर को रोमांटिक साइन किया गया था। केज ,त्याग, तब ,तर्क, तीर, तलवार जैसे शब्द उनके लिए इस्तेमाल किए गए थे। बीजेपी के नेताओं में मोदी जी अकेले नहीं हैं जो सावरकर को ग्लोरी फाइल करते हैं। सितंबर 2015 में अमित शाह ने अपना पहला ब्लॉग सावरकर को साथ समर्पित किया था। उसमें उन्होंने उनकी बहुत तारीफ की थी कि वह डेमोक्रैट थे और धर्म निरपेक्ष थे और तमाम धर्मों के फॉलोअर को बराबर ट्रीट करते थे। लेकिन क्या ये वास्तविक थी। संघ परिवार में आज सावरकर की हीरो वह शिपिंग होती है तो फिर सावरकर कभी आरएसएस से क्यों नहीं जुड़े और सिर्फ हिंदू महासभा को इंडिपेंडेंट ही क्यों मजबूत करने का प्रयास करते रहे। क्या वजह थी कि 1937 में जब डिटेंशन से छूटे और पब्लिक लाइफ में एंटर हुए उसके बाद भी सावरकर ने अपनी पूरी एनर्जी सिर्फ महासभा को मजबूत करने में लगा दिया। उन्होंने क्यों कहा कि ” The epitaph for the RSS volunteer will be that he was born,he joined the RSS and died without accomplishing anything” एक अजीब सी विडंबना है कि सावरकर की आरएसएस के प्रति इतनी कटुता होने के बावजूद आज वे इस सरकार के मीन ड्राइवर प्रतीत होते हैं।
पातो दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय से शुरू हुई थी। मगर इतना सावरकर सूत्र 2019 के चुनाव के बाद कैसे और क्यों दिखने लगा है। सावरकर के पब्लिक केम्ब्रिज के पीछे क्या कारण है इन सवालों को समझने के लिए हमको सावरकर की राजनीतिक जिंदगी को ढाई सेट करना पड़ेगा।

सावरकर का पॉलिटिकल करियर 3 क्लियर चैप्टर्स में डिवाइड किया जा सकता है।पहला अध्याय उनके जन्म से उनके कन्विक्शन और अंदमान की सेलुलर जेल में डिटेंशन तक दूसरा चैप्टर 1911 में जेल के अंदर शुरू हुआ और 1937 तक कंटीन्यू किया जब उनको फाइनली ब्रिटिश सरकार ने घूमने फिरने और पॉलिटिकली पार्टिसिपेट करने की अनुमति दे दी। तीसरा अध्याय इसके बाद पॉलिटिकल एक्टिविस्ट या लीडर के तौर पर। और ये 1966 तक चला जब उनकी मृत्यु हुई।
अपने जिन्दगी के फर्स्ट फेज में सावरकर क्रांतिकारी थे और अंग्रेजों के खिलाफ रेवोल्यूशनरी आक्शन में एक्टिव रहे। इस दौरान उन्होंने 1857 की आजादी की लड़ाई पर एक चर्चित किताब इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857ये भी लिखी। उल्लेखनीय है कि काल मार्क्स ने भी 1857की लड़ाई को इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस कहा था। इस पीरियड में सावरकर के थॉट्स में हिंदू राष्ट्रवाद की झलक तो दिखाई देती है मगर इन टेंडेंसी इसको काफी हद तक उन्होंने कंट्रोल किया। अपनी जिन्दगी के दूसरे फेज में सावरकर का ट्रांसफॉर्मेशन हुआ। 1911से 37 के बीच में 27 सालों में कि एक क्रांतिकारी से वह हिन्दू नैशनलिस्ट के रिवर डायलॉग में बदल गए।

ये वही पीरियड है जब उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद की आइडियोलॉजी को मोडिफाई किया और उस आइडिया को कोहेरेंट बनाया। इस पीरियड में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनकी एक पतली सी किताब जिसको बाइबिल माना जाता है। हिन्दू राष्ट्रवाद की ताकतों द्वारा किताब का नाम हिंदुत्व हिन्दू कौन है। इस पीरियड में सावरकर ने हिंदुत्व को परिभाषित करने के अलावा और भी कुछ लिखा। इन सबमें हिन्दू विक्टिम हुड के नैरेटिव को प्रोपेगेंडा किया गया। इस पीरियड में ब्रिटिश सरकार ने उनके मूवमेंट को रोका लेकिन उनकी राइटिंग और पीचिंग पर कोई पाबंदी नहीं लगी। इसका कारण शायद सावरकर द्वारा ब्रिटिश को लिखे गए उनके मसीह पिटीशन और माफीनामा थी। एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि ब्रिटिश सरकार को सर्व करने के लिए वो तैयार हैं, और जगह उन्होंने लिखा “where else can the prodigal son return but to the parental doors of the government” सावरकर ने मुंडू चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स का भी समर्थन किया जबकि बाकी नैशनलिस्ट खासतौर पर कांग्रेस के नेता इन प्रपोजल्स का विरोध कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि वे एक्ट को सक्सेसफुल बनाएंगे और कानून व्यवस्था को मेनटेन करने में मदद करेंगे।

ये वही दौर है जब सावरकर जिन्होंने 1857 की लड़ाई में हिंदू मुसलमान यूनिटी की सरहाना की थी। खिलाफत मूवमेंट को आफत कहकर डिसमिस करने लगे उनका रेवोल्यूशनरी स्पिरिट और इनक्लूसिव आइडियाज धीरे धीरे इतिहास बन गया
सावरकर की जिंदगी का लास्ट और तीसरा फेज सबसे कम सिग्नल फिक्शन था। जेल में 26 साल रहने के बाद किसी नैशनलिस्ट को अगर रिहा किया जाता तो क्या वह आजादी की लड़ाई में नहीं जुट जाता। लेकिन सावरकर ने ऐसा कुछ नहीं किया। वे तो सिर्फ हिंदू समाज को मजबूत करने में जुट गए। सेकंड वर्ल्ड वॉर में उन्होंने हिंदुओं को ब्रिटिश आर्मी में एनालिस्ट होने के लिए भी एनकरेज किया। उनका कहना था कि इस सारे हिंदू मिलिट्री राइट्स हो जाएंगे और इतिहास में उनके साथ जो गलत हुआ उसका बदला ले पाएंगे। इस के बावजूद हिंदू महासभा अपनी हिंदू पोलिटिकल कंसिस्टेंसी को क्रिएट नहीं कर पाई और पार्टी एक बस और ट्रेन की तरह लगाती रही। गांधीजी की हत्या के बाद तो सावरकर खुद शक के दायरे में आ गए। उनको कोर्ट ने तो माफ कर दिया, मगर जनता की अदालत ने उन्हें कभी माफ नहीं किया। जब जीवन लाल कपूर कमीशन ऑफ इन्क्वायरी और कॉन्सेप्ट रेडी टू मर्डर महात्मा गांधी की रिपोर्ट सितंबर 1969 में सबमिट की गई तो सावरकर के बारे में बहुत सेंसेशनल बात लिखी गई। फैक्ट्स ,अंसतुष्ट और इसका पृष्ठ पर कमीशन टेकन टुगेदर। वह डिस्ट्रक्टि ऑफ इन्हीं खेरी अदर दैन द क्वीन स्पिरिट सी टू मर्डर बाई सावरकर एंड स्क्रू कपूर कमीशन की रिपोर्ट यह साबित करती है कि महात्मा गांधी मर्डर केस में नीट लॉस सस्पेंशन आज भी सावरकर की दिशा में पॉइंट करती है। इस बात को लेकिन आज दरकिनार कर दिया गया है और सावरकर को एक आइकोनिक नैशनलिस्ट के तौर पर पेश किया जाता है।

बहुत दुख की बात है कि संसद के सेंट्रल हॉल में उनका पोर्ट्रेट ठीक उस जगह लगा हुआ है जहां गांधी जी की छवि भी लगी हुई है। सावरकर की जिंदगी के कुछ पहलुओं को हाईलाइट करके और बाकी को इग्नोर करके उनको नैशनल हीरो बना देना एक पॉलिटिकल पर्पस का प्रतीक है सावरकर ने अगर बहुत मूविंग इमोशनल पोएट्री लिखी तो उन्होंने बहुत कम्युनल फिक्शन भी लिखा। सावरकर ने अपनी यह किताब सिक्स ग्लोरियस स्पोक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री में मुसलमान औरतों के रेप को एक पॉलिटिकल टूल की तरह इस्तेमाल करने को जस्टिफाई। एक और गाथा में उन्होंने एक मुसलमान पात्र से कहलवाया था कि वे हिंदू लड़कियों को शक करना पसंद करते हैं। करप्ट सो मेनी हिन्दू गर्ल्स एमएंडएम माय मिस्ट्रेस दैट हंड्रेड ऑफ मुस्लिम्स कंसीडर मी अटरू मिशनरी एंड टीचर ऑफ इस्लाम दिस इस वी कोस आयत प्रोड्यूस फ्रोजेन थ्रू दिस विमिन हू,जिन्होंने इतना जहर घोला क्या उनको नैशनल हीरो बनाना ठीक है।

आज अगर भारत में कोई कहे कि वो सावरकर को पूजना नहीं चाहता तो उन्हें या तो ट्रोल किया जाएगा या फिर किसी ना किसी तरीके से टारगेट किया जाएगा। कोई अगर आज कहे कि वीरता सावरकर का सबसे अहम ट्रिब्यूट नहीं था तो उन्हें दुत्कारा जाएगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी के एबीवीपी के छात्रों ने भगत सिंह का पोस्ट भी लगाया था। भगत सिंह पर उतने ही सीरियस साजिस थे जितना कि सावरकर पर। मगर वे शहीद हो गए जबकि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से पेमेंट सीट मांगी। अब आप सोचिए कि क्या दोनों को एक ही पहलू पर रखना सही होगा। क्या डेमोक्रेटिक भारत में हर नागरिक खुद नहीं तय कर सकता कि उसका हीरो कौन हो। क्या जरूरी है कि मेजोरिटी के हीरो को अपना आदर्श माना जाए। इन जवाबों में हमारे भविष्य का इंडिकेशन छिपा हुआ है।