अकबर की गलती से हुयी बीरबल की मृत्यु | Birbal Died Due To Akbar’s Mistake

कहा जाता है कि लाशों के अंबार में बीरबल की लाश का भी कुछ पता न चला और बीरबल का उनके धर्म के अनुसार क्रियाकर्म भी नहीं हो सका।

0
799
अकबर की गलती से हुयी थी बीरबल की मृत्यु
अकबर की गलती से हुयी थी बीरबल की मृत्यु

अकबर की गलती से हुयी बीरबल की मृत्यु
Birbal (Mahesh Das) Died Due To Akbar’s Mistake


इतिहास में कई सारे राजा महाराजा हुए। उन राजा महाराजाओं के साथ कोई न कोई दरबारी कवि सिपहसलार जैसे कई लोगों का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे इतिहास की एक मशहूर जोड़ी अकबर और बीरबल के बारे में। शायद ही ऐसा कोई हो जिसने अकबर और बीरबल के किस्सों के बारे में न सुना हो। इन दोनों के किस्सों पर तो कई कहानियां भी प्रचलित हैं।

हम बात करेंगे अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल की मृत्यु के बारे में, कि आखिर कैसे समझदार बीरबल का अंत हुआ। इस बात से हर कोई वाकिफ नहीं है। बीरबल ने अपनी महारत से अकबर पर ऎसा जादू कर दिया था, कि अकबर ने उन्हें अपने दरबार में वजीर का ओहदा दे दिया था। हालांकि बात यहीं नहीं रूकी। माना जाता है कि अकबर ने बीरबल को वजीर से राजा बनाने का फैसला भी कर लिया था। इसी के तहत अकबर ने बीरबल को खूब सारा सोना, सेना और काँगड़ा में विशाल जागीरे दे दी, जिसके बाद लोगों ने बीरबल को राजा बीरबल कहना शुरू कर दिया।

इसी समय अफगानिस्तान के बाजौर में कुछ लोग अपनी ताकत से वहां के लोगों को लूट रहे थे। लोग इस जबरन वसूली से बहुत ही ज्यादा परेशान हो चुके थे। आबादी अब वीरान हो रही थी, हजारों लोगों का सामूहिक पलायन होना शुरू हो गया। ऐसी स्थिति में अकबर ने अपने अहम सिपहसालार जीएन खान कोका को अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए चुना। वहां मुगल सेना का एक प्रमुख सैनिक था। जीएन खान युद्ध का साजो सामान लेकर अफगान के इस कठिन इलाके की ओर निकल पड़ा।

अफगान जाने का रास्ता जंगल पहाड़ियों से होकर गुजरता था, जिसके बारे में सेना के किसी भी इंसान को जानकारी नहीं थी। हालांकि नदियों पहाड़ों और जंगलों को लांघते हुए मुगल सेना अफगान के उस इलाके में पहुंची जहां इनका मुकाबला अफगान के यूसुफजई नाम के ताकतवर कबीले के साथ होना था। ऐसा कहा जाता है कि जब अफगानों के साथ युद्ध होता था तो वो बड़ी बहादुरी के साथ लड़ते थे। इनके लिए पहाड़ों पर चढ़ना दाएं हाथ का खेल होता था। वो लोग पेड़ों पर चढ़ने में भी माहिर थे, मगर मुगल सेना इन सब बातों से अनजान थी। हालांकि फिर भी उन्होंने जंग शुरू की। अफगानी सेना सामने से मुकाबला नहीं कर रही थी। वह गुरिल्ला युद्ध की तरह मुगल सेना से लड़ते रहे। इसका खामियाजा मुगल सेना को उठाना पड़ा और उनका काफ़ी नुकसान भी हुआ। मुगल सेना पहाड़ों की चढ़ाई करते हुए थक चुकी थी। उनका राशन पानी भी खत्म होने लगा था जिसे आगे बढ़ने में कठिनाई हो रही थी। अफगान सेना से लड़ना उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल था। कहते हैं कि मुगल तकरीबन यह जंग हार ही चुके थे तभी ज़ेन खान कोका ने एक चाल चली धारणाओं की मानें तो जेन खान ने अकबर को एक झूठी चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में उसने कहा कि वह लगभग जंग जीत चुका है और अफगान को पूरी तरह से पाने के लिए उसे थोड़ी सी और सेना की जरूरत थे। इसके बाद वह दूसरी टुकड़ी के आने के इंतजार में गहरी घाटियों में जाकर बैठ गया।

जब जेन खान का पैगाम आया तो अकबर ने इस बात पर गौर किया कि आखिर किस फौज को भेजा जाए जो जेन खान के साथ जीत का परचम लहराए। उस वक्त दरबार में अबुल फजल और बीरबल भी मौजूद थे। कहते हैं कि अबुल फजल ने इस युद्ध में जाने की इच्छा जताई तो अकबर ने उसे साफ मना कर दिया। हालांकि जब अकबर से बीरबल ने जेन खान की सहायता हेतु जाने की आज्ञा मांगी तो अकबर तुरंत तैयार हो गया। तब बीरबल को सेनापति नियुक्त किया गया और आठ हजार की फौज के साथ अफगान रवाना कर दिया गया। बीरबल अक्लमंद व्यक्ति तो थे मगर उनको युद्ध नीतियों के बारे में महारत हासिल नहीं थी। जब बीरबल की फौज अफगानियों के साथ मुकाबला करने मैदान में उतरी तो पहाड़ी लोगों के सामने बीरबल की फौज भारी पड़ी। मुगलों की फौज ने कई सारे अफगानियों को मार गिराया। हालांकि लड़ते लड़ते अंधेरा हो गया जिसके कारण युद्ध पर विराम लगाना पड़ा।

इसके बाद बीरबल अपनी सेना के साथ अगले दिन की लड़ाई की रणनीति बनाने लगे। कहा जाता है कि जब बीरबल की सेना अफगानियों से युद्ध कर रही थी तभी अकबर ने अपने एक और दरबारी हकीम अबुल फतेह को भी एक फौज की टुकड़ी के साथ अफगान भेज दिया। बीरबल की तरह की मक़बूल फतेह को भी युद्ध की नीतियों के बारे में जानकारी नहीं थी। साथ में ये भी कहा जाता है कि जेन खान, अब्दुल फतेह और बीरबल में आपसी मतभेद भी होते रहे। ये तीनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे। इसके कारण तीनों एक दूसरे की सलाह को मानने से इनकार करते थे। एक बात पर कभी तीनों की सहमति नहीं बनती थी।

आपसी फूट के साथ वह तीनों अफगानिस्तान की बुलंदी घाटी में घुसे। इसके बाद बीरबल ने आगे की योजना बताई मगर कोई भी उस पर राजी नहीं हुआ। इसके बाद तीनों ने अपने अपने अलग रास्तों पर जाने की ठान ली। बीरबल अगले दिन आक्रमण के लिए तीन से चार को उसका सफर तय करके रात को रुक जाते थे। बीरबल अपनी सेना को लेकर जिस जगह पर रुकते हैं वहीं दुश्मन की फौज घात लगाए बैठी थी। रात के अंधेरे में अचानक अफगान की फौज ने बीरबल की सेना को चारों ओर से घेर लिया और उन पर पत्थर और तीर बरसाने शुरू कर दिए।

घबराहट के मारे सेना और जानवर तितर बितर हो गए जिससे सेना में भगदड़ मच गई। रात के इस अंधेरे में जो जहां भाग पाया भाग गया। इससे कई सारे सैनिकों की मौत हो गई। बीरबल ने भी कोशिश की, बचने की मगर तब तक अफगानी सेना ने उनको तीरों से तार तार कर दिया। कोई मदद न मिल पाने के कारण वहीं पर बीरबल की मौत हो गई। कहा जाता है कि लाशों के अंबार में बीरबल की लाश का भी कुछ पता न चला और बीरबल का उनके धर्म के अनुसार क्रियाकर्म भी नहीं हो सका।

अकबर को बीरबल की मौत से बहुत बड़ा झटका लगा। हर कोई हैरान था यह जानकर कि बीरबल जैसा कोई विद्वान ऐसे कैसे मारा गया। इसके साथ ही महान बीरबल का अंत हो गया। बीरबल की मौत किस प्रकार होगी ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। हालांकि किस्मत के आगे किसी की नहीं चलती।