सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य

सिर्फ नेताजी के बारे में ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के लिए उन्हें विदेशों में रहने वाले भारतीयों से दान में मिली करोड़ों रुपये की संपत्ति का भी कोई पता नहीं है।

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य | Netaji Subhash Chandra Bose Death Mystery
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य | Netaji Subhash Chandra Bose Death Mystery

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य
Netaji Subhash Chandra Bose Death Mystery


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक सुभाष चंद्र बोस के जीवन के बारे में छाया रहस्य 75 साल बाद भी नहीं सुलझ पाया है। इतना ही नहीं आजादी की लड़ाई के लिए विदेशों में बसे भारतीयों से उन्हें दान में मिली करोड़ों रुपये की धन संपत्ति का भी कोई अता पता नहीं है।

23 जनवरी 1897 को जन्मे सुभाष चंद्र बोस के बारे में कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान की वायुसीमा में कथित विमान हादसे में उनकी मौत हो गई थी, लेकिन इस दावे में भी कई विरोधाभास सामने आए हैं। सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर पुस्तक लिखने वाले अनुज धर का कहना है कि सिर्फ नेताजी के बारे में ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के लिए उन्हें विदेशों में रहने वाले भारतीयों से दान में मिली करोड़ों रुपये की संपत्ति का भी कोई पता नहीं है। धर ने अपनी पुस्तक ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर अप’ में आरोप लगाया है कि नेताजी की इस धन संपत्ति को देश के कुछ बड़े लोगों ने ‘‘लूट’’ लिया और भारत सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की।

उन्होंने लिखा है कि तोक्यो में भारतीय मिशन के तत्कालीन प्रमुख और बाद में लंबे समय तक भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे सर बेनेगल रामा राव ने इस बारे में चार दिसंबर 1947 को भारत सरकार को सूचित किया था, लेकिन उन्हें कोई उत्साहजनक उत्तर नहीं मिला। किताब में विदेश मंत्रालय के अति गोपनीय दस्तावेजों का हवाला देकर दावा किया गया है कि संपत्ति मामले को प्रकाश में लाने में एक और मिशन प्रमुख केके चेत्तूर की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर आजादी की लड़ाई के लिए विदेशों में बसे भारतीयों ने उन्हें करोड़ों रुपये की संपत्ति दान में दी थी। इसमें हीरे जवाहरात, सोना चांदी और नकदी शामिल थी।

धर ने कई गोपनीय दस्तावेजों और तस्वीरों के हवाले से दावा किया है कि नेताजी 1985 तक जीवित थे।नेताजी के बारे में बहुत से किस्से कहानियां प्रचलित हैं।कई साधु संतों ने खुद के नेताजी होने का दावा किया, लेकिन सचाई कभी साबित नहीं हो पाई।ताइवान सरकार अपना रिकॉर्ड देखकर यह खुलासा कर चुकी है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के उपर कोई विमान हादसा नहीं हुआ था। नेताजी के बारे में हुई जांचों से भी कोई सचाई सामने नहीं आई। ताइवान में कथित विमान हादसे के समय नेताजी के साथ जा रहे कर्नल हबीबुर रहमान ने आजाद हिन्द सरकार के सूचना मंत्री एस ए नैयर, रूसी तथा अमेरिकी जासूसों के समक्ष अलग अलग बयान दिए।

रहमान ने कभी कहा कि उन्होंने नेताजी के जलते हुए कपड़े उनके बदन से उतारे थे तो कभी अपने बारे में कहा कि वह तो खुद इस हवाई दुर्घटना में बेहोश हो गए थे और उन्हें ताइपै के एक अस्पताल में होश आया। कभी उन्होंने नेताजी के अंतिम संस्कार की तारीख 20 अगस्त तो कभी 22 अगस्त 1945 बताई। रहस्य से पर्दा उठाने के उद्देश्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शाहनवाज खान के नेतृत्व में अप्रैल 1956 में बनाई गई जांच समिति ने विमान हादसे की बात को सच बताया था, लेकिन समिति में शामिल रहे नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस ने इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया और आरोप लगाया कि सचाई जानबूझकर छिपाई जा रही है।

जुलाई 1970 में गठित न्यायमूर्ति जीडी खोसला आयोग ने भी शाहनवाज समिति जैसी ही रिपोर्ट दी। इसके बाद नेताजी के रहस्य के बारे में जांच के लिए तीसरा आयोग 1999 में गठित किया गया।इस मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में नेताजी की विमान हादसे में मौत को पूरी तरह खारिज कर दिया तथा मामले में और जांच की जरूरत बताई। आठ नवम्बर 2005 को भारत सरकार को सौंपी गई मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट 17 मई 2006 को संसद में पेश की गई, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया।


आज़ाद हिन्द फ़ौज और रानी झांसी रेजिमेंट

सन 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की बागडोर संभाल ली थी। 6 हफ़्तों के भीतर भीतर 30000 सदस्यों से बढ़कर 60000 लोग आईएनए के सदस्य बन चुके थे। जो वॉलंटियर्स आए थे, वो इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, हांगकांग जैसी जगहों से थे। बोस के मन में कुछ चल रहा था जो इस स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक अनोखी बात थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों की एक पलटन बनाना चाहते थे।

सिंगापुर में आज़ाद हिन्द फ़ौज की कमान संभालने वाली टीम में थे के. पी. केशव मेनन, एस. सी. गुहा, और एन. राघवन. इन लोगों ने बहुत कोशिश की कि आज़ाद हिन्द फ़ौज को जापानी सेना के साथ लड़ने का मौका मिले, लेकिन जापानी इस बात को लेकर कुछ भी पक्का नहीं कर रहे थे। तब आए नेताजी सुभाष चंद्र बोस। उनके आने पर चीज़ें तेज़ी से निपटनी शुरू हुईं। लक्ष्मी स्वामीनाथन नाम की डॉक्टर उस समय सिंगापुर में ही थीं। मद्रास मेडिकल कॉलेज से अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर वहां गई थीं, और प्राइवेट प्रैक्टिस कर रही थीं। लक्ष्मी जानती थीं कि नेताजी की बड़ी इच्छा है कि औरतें भी आज़ादी की इस लड़ाई में भाग लें। नेताजी के साथ उन्मीहोंने एक मीटिंग की दरख्वास्त दी। मीटिंग से बाहर निकलते ही उनको आदेश मिल चुके थे एक महिला रेजिमेंट बनाने के।

नाम होना था, रानी झांसी रेजिमेंट। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर गठित महिलाओं की एक टुकड़ी। 1500 ट्रेंड महिला सैनिक, और 200 नर्सें। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने आज़ाद हिन्द सरकार बनाई थी, और उसमें लक्ष्मी स्वामीनाथन को मंत्री बनाया था। इसके दो दिन बाद से रानी झांसी रेजिमेंट की ट्रेनिंग शुरू हो गई थी। यानी 23 अक्टूबर 1943 को। सभी को खाकी वर्दी पहननी होती थी, और बाल छोटे रखने होते थे।

पहला अटैक शुरू हुआ सिंगापुर से रंगून की तरफ, जहां से आज़ाद हिन्द फ़ौज को इम्फाल जाना था। लेकिन बीच में ही ब्रिटिश सेना ने उनका ये अटैक रोक लिया। आईएनए के सैनिक इस अटैक के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें पीछे हटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने दोबारा अटैक किए, लेकिन इस अटैक में रानी झांसी रेजिमेंट शामिल नहीं थी। इसे ख़त्म कर दिया गया था। जिन महिलाओं/लड़कियों के घर बर्मा में थे, उनको वापस भेज दिया गया था।

रेजिमेंट की सारी औरतों ने खून से साइन करके चिठ्ठी भेजी थी नेताजी को कि वो रानी झांसी रेजिमेंट को बना रहने दें, लेकिन ऐसा हो ना सका। कैप्टेन लक्ष्मी वहीं बर्मा में रुकीं, और आईएनए के एक अस्पताल में ज़ख़्मी लोगों की सेवा में लग गईं। उन सबको ये लगा था कि किसी को उनकी इस जगह का पता नहीं चलेगा, लेकिन ब्रिटिश सेना को इसका पता चल गया। जिस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनसे मिलने आए, उसके अगले दिन अस्पताल पर बम गिरा दिए गए। कैप्टन लक्ष्मी और उनके साथी जब घायलों को बैलगाड़ी पर लेकर भाग रहे थे, तब रास्ते में ब्रिटिश सेना ने उनको पकड़ लिया। रानी झांसी रेजिमेंट बहुत लम्बे समय तक नहीं चली, लेकिन इनकी मौजूदगी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी की एक मुकम्मल यादगार है।


नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विचार (Important quotes from Subhash Chandra Bose)

“तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें आजादी दूंगा !”

“ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं. हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिलेगी, हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए.”

“आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशश्त हो सके.”

“मुझे यह नहीं मालूम की स्वतंत्रता के इस युद्ध में हममे से कौन कौन जीवित बचेंगे ! परन्तु में यह जानता हूँ ,अंत में विजय हमारी ही होगी !”

“राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्श सत्य, शिव और सुन्दर से प्रेरित है .”

“भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अन्दर से सुसुप्त पड़ी थी .”

“मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्यायों जैसे गरीबी ,अशिक्षा , बीमारी , कुशल उत्पादन एवं वितरण का समाधान सिर्फ समाजवादी तरीके से ही की जा सकती है .”

“यदि आपको अस्थायी रूप से झुकना पड़े तब वीरों की भांति झुकना !”

“समझोतापरस्ती बड़ी अपवित्र वस्तु है !”

“मध्या भावे गुडं दद्यात — अर्थात जहाँ शहद का अभाव हो वहां गुड से ही शहद का कार्य निकालना चाहिए !”

“संघर्ष ने मुझे मनुष्य बनाया ! मुझमे आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ ,जो पहले नहीं था !”

“कष्टों का निसंदेह एक आंतरिक नैतिक मूल्य होता है !”

“मुझमे जन्मजात प्रतिभा तो नहीं थी ,परन्तु कठोर परिश्रम से बचने की प्रवृति मुझमे कभी नहीं रही !”

“जीवन में प्रगति का आशय यह है की शंका संदेह उठते रहें और उनके समाधान के प्रयास का क्रम चलता रहे !”

“हम संघर्षों और उनके समाधानों द्वारा ही आगे बढ़ते हैं !”

“हमारी राह भले ही भयानक और पथरीली हो ,हमारी यात्रा चाहे कितनी भी कष्टदायक हो , फिर भी हमें आगे बढ़ना ही है ! सफलता का दिन दूर हो सकता है ,पर उसका आना अनिवार्य है !”

“श्रद्धा की कमी ही सारे कष्टों और दुखों की जड़ है !”

“अगर संघर्ष न रहे ,किसी भी भय का सामना न करना पड़े ,तब जीवन का आधा स्वाद ही समाप्त हो जाता है !”

“मैं संकट एवं विपदाओं से भयभीत नहीं होता ! संकटपूर्ण दिन आने पर भी मैं भागूँगा नहीं वरन आगे बढकर कष्टों को सहन करूँगा !”

“इतना तो आप भी मानेंगे ,एक न एक दिन तो मैं जेल से अवश्य मुक्त हो जाऊँगा ,क्योंकि प्रत्येक दुःख का अंत होना अवश्यम्भावी है !”

“असफलताएं कभी कभी सफलता की स्तम्भ होती हैं !”

“सुबह से पहले अँधेरी घडी अवश्य आती है ! बहादुर बनो और संघर्ष जारी रखो ,क्योंकि स्वतंत्रता निकट है ! ”

“समय से पूर्व की परिपक्वता अच्छी नहीं होती ,चाहे वह किसी वृक्ष की हो ,या व्यक्ति की और उसकी हानि आगे चल कर भुगतनी ही होती है !”

“अपने कॉलेज जीवन की देहलीज पर खड़े होकर मुझे अनुभव हुआ ,जीवन का कोई अर्थ और उद्देश्य है !”

“निसंदेह बचपन और युवावस्था में पवित्रता और संयम अति आवश्यक है !”

“में जीवन की अनिश्चितता से जरा भी नहीं घबराता !”

“मैंने अमूल्य जीवन का इतना समय व्यर्थ ही नष्ट कर दिया ! यह सोच कर बहुत ही दुःख होता है ! कभी कभी यह पीड़ा असह्य हो उठती है ! मनुष्य जीवन पाकर भी जीवन का अर्थ समझ में नहीं आया ! यदि मैं अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाया ,तो यह जीवन व्यर्थ है ! इसकी क्या सार्थकता है ?”

“परीक्षा का समय निकट देख कर हम बहुत घबराते हैं ! लेकिन एक बार भी यह नहीं सोचते की जीवन का प्रत्येक पल परीक्षा का है ! यह परीक्षा ईश्वर और धर्म के प्रति है ! स्कूल की परीक्षा तो दो दिन की है ,परन्तु जीवन की परीक्षा तो अनंत काल के लिए देनी होगी ! उसका फल हमें जन्म-जन्मान्तर तक भोगना पड़ेगा !”

“मुझे जीवन में एक निश्चित लक्ष्य को पूरा करना है ! मेरा जन्म उसी के लिए हुआ है ! मुझे नेतिक विचारों की धारा में नहीं बहना है ! ”

“भविष्य अब भी मेरे हाथ में है !”

“मेरे जीवन के अनुभवों में एक यह भी है ! मुझे आशा है की कोई-न-कोई किरण उबार लेती है और जीवन से दूर भटकने नहीं देती !”

“मैंने जीवन में कभी भी खुशामद नहीं की है ! दूसरों को अच्छी लगने वाली बातें करना मुझे नहीं आता ! ”

“मैं चाहता हूँ चरित्र ,ज्ञान और कार्य”

“चरित्र निर्माण ही छात्रों का मुख्य कर्तव्य है !”

“हमें केवल कार्य करने का अधिकार है ! कर्म ही हमारा कर्तव्य है ! कर्म के फल का स्वामी वह (भगवान ) है ,हम नहीं !”

“कर्म के बंधन को तोडना बहुत कठिन कार्य है !”

“व्यर्थ की बातों में समय खोना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता !”

“मैंने अपने छोटे से जीवन का बहुत सारा समय व्यर्थ में ही खो दिया है !”

“माँ का प्यार सबसे गहरा होता है ! स्वार्थ रहित होता है ! इसको किसी भी प्रकार नापा नहीं जा सकता !”

“जिस व्यक्ति में सनक नहीं होती ,वह कभी भी महान नहीं बन सकता ! परन्तु सभी पागल व्यक्ति महान नहीं बन जाते ! क्योंकि सभी पागल व्यक्ति प्रतिभाशाली नहीं होते ! आखिर क्यों ? कारण यह है की केवल पागलपन ही काफी नहीं है ! इसके अतिरिक्त कुछ और भी आवश्यक है !”

“भावना के बिना चिंतन असंभव है ! यदि हमारे पास केवल भावना की पूंजी है तो चिंतन कभी भी फलदायक नहीं हो सकता ! बहुत सारे लोग आवश्यकता से अधिक भावुक होते हैं ! परन्तु वह कुछ सोचना नहीं चाहते !”

“मेरी सारी की सारी भावनाएं मृतप्राय हो चुकी हैं और एक भयानक कठोरता मुझे कसती जा रही है !”

“हमें अधीर नहीं होना चहिये ! न ही यह आशा करनी चाहिए की जिस प्रश्न का उत्तर खोजने में न जाने कितने ही लोगों ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया ,उसका उत्तर हमें एक-दो दिन में प्राप्त हो जाएगा !”

“एक सैनिक के रूप में आपको हमेशा तीन आदर्शों को संजोना और उन पर जीना होगा निष्ठा कर्तव्य और बलिदान। जो सिपाही हमेशा अपने देश के प्रति वफादार रहता है, जो हमेशा अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहता है, वो अजेय है. अगर तुम भी अजेय बनना चाहते हो तो इन तीन आदर्शों को अपने ह्रदय में समाहित कर लो.”

“याद रखें अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपराध है.

“एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है .”

“स्वामी विवेकानंद का यह कथन बिलकुल सत्य है ,यदि तुम्हारे पास लोह शिराएं हैं और कुशाग्र बुद्धि है ,तो तुम सारे विश्व को अपने चरणों में झुक सकते हो !”