गामा पहलवान: भारतीय कुश्ती की एक अविश्वसनीय अपराजेय कहानी | Gama Pahalwan: Unbelievable Story of Indian Wrestling History

वे एक दिन में 1000 पुशअप लगाते थे और गामा हर दिन 6 देसी मुर्गे, 15 लीटर दूध, आधा किलो घी और आधा किलो बादाम खाते थे।

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गामा पहलवान: भारतीय कुश्ती की एक अविश्वसनीय अपराजेय कहानी | Gama Pahalwan: Unbelievable Story of Indian Wrestling History
गामा पहलवान: भारतीय कुश्ती की एक अविश्वसनीय अपराजेय कहानी | Gama Pahalwan: Unbelievable Story of Indian Wrestling History

गामा पहलवान: भारतीय कुश्ती की एक अविश्वसनीय अपराजेय कहानी |

Gama Pahalwan: Unbelievable Story of Indian Wrestling History


आज  बात करते  हैं, द ग्रेट गामा पहलवान की। गामा पहलवान जैसे प्रसिद्ध और अपने जीवन  मे कभी ना हारने वाले पहलवान गुलाम मोहम्मद की जिन्होंने भारतीय कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और भारत का नाम पूरे विश्व में उंचा किया। सबसे दिलचस्प बात कि, लगभग 52 साल के कैरियर में गामा को कोई भी नहीं हरा सका। वे एक दिन में 1000 पुशअप लगाते थे और उनकी डायट को सुनकर तो हैरान ही रह जाएंगे। गामा हर दिन 6 देसी मुर्गे, 15 लीटर दूध, आधा किलो घी और आधा किलो बादाम खाते थे।

अपने पहलवानी के दौर में गामा की उपलब्धियां इतनी अविश्वसनीय थीं कि, आजकल के लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि गामा जैसा पहलवान वास्तव में कभी हुए थे। यहां तक कि मार्शल आर्ट के बादशाह ब्रूस ली भी गामा पहलवान के दीवाने थे।

गामा पहलवान और मार्शल आर्ट के बादशाह ब्रूस ली
गामा पहलवान और मार्शल आर्ट के बादशाह ब्रूस ली

गामा पहलवान का जन्म 22 मई 1878 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद अजीज था, जो कि एक प्रसिद्ध पेशेवर पहलवान थे, लेकिन गामा के जन्म के कुछ ही सालों के बाद उनकी मृत्यु हो गई और तब दतिया के महाराज ने गामा को पहलवानी की ट्रेनिंग देने के लिए अपने पास रख लिया। जिसके बाद पहलवानी सीखते हुए गामा ने सिर्फ 10 साल की छोटी सी उम्र में कई महारथियों को धूल चटा दी और इतने छोटे उम्र में अपने अद्भुत टैलेंट की वजह से वे आस-पास के राज्यों में बहुत तेजी से प्रसिद्ध होने लगे। लेकिन गामा का नाम पूरे देश में तब प्रसिद्ध हुआ जब उन्होंने 1895 में सिर्फ 17 साल की उम्र में रुस्तम-ए-हिंद रहीम बक्श सुल्तानी वाला को चैलेंज दे डाला।

रहीम की लंबाई 6 फुट 9 इंच थी जबकि गामा सिर्फ 5 फुट 7 इंच के थे, लेकिन उस ऊचाई से गामा को जरा भी डर नहीं लगा। उन्होंने उस मैच में रहीम से बराबर की कुश्ती लड़ी और आखिरकार मैच ड्रॉ हो गया। उन दिनों रहीम के आगे कोई भी नहीं टिक पाता था लेकिन 17 साल के इस लड़के ने मैच ड्रॉ करवाके सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। साल दर साल गामा पहलवान की प्रसिद्धि बढ़ती रही और गामा ने 1898 से लेकर 1907 के बीच दतिया के गुलाम मोहिउद्दीन, भोपाल के प्रताप सिंह, इंदौर के अलीबाबा सिंध और मुल्तान के हसन जैसे नामी पहलवानों को लगातार हराया। 1910 में एक बार फिर से गामा का सामना रुस्तम-ए-हिंद रहीम बक्श से हुआ लेकिन इस बार भी मैच ड्रॉ रहा।

अब तक गामा एक ऐसे पहलवान बन चुके थे जिन्हें रिंग में कोई भी नहीं हरा सकता था। भारत में अजेय रहने के बाद गामा ब्रिटेन गए और वहां जाकर उन्होंने विदेशी पहलवानों को धूल चटाने का मन बनाया लेकिन लंबाई कम होने की वजह से उन्हें वेस्टर्न फाइटिंग में शामिल नहीं किया गया। इस बात का गामा को बहुत दुख हुआ और उन्होंने वहां के सबसे बड़े पहलवान स्टेनिसलास जबिस्को को खुली चुनौती दे डाली। वर्ल्ड चैम्पियन स्टेनिसलास ने भी गामा के दिए हुए चुनौती को स्वीकार कर ली और आखिरकार 10 सितंबर 1910 को उनकी फाइट हुई। दो घंटे 35 मिनट तक वह फाइट चलने के बाद उसका कुछ भी नतीजा नहीं निकला और मैच ड्रा रहा। मैच दोबारा 19 सितंबर को होना तय हुआ लेकिन जबिस्को मैच में आने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया और इस तरह गामा वर्ल्ड हैवीवेट चैम्पियन बनने वाले पहले भारतीय पहलवान बने।

गामा पहलवान वर्ल्ड चैंपियन रेसलर
गामा पहलवान वर्ल्ड चैंपियन रेसलर

1911 में इंग्लैंड से लौटने के बाद गामा का सामना फिर से रहीम बक्स से हुआ लेकिन इस बार मैच ड्रा नहीं हुआ। इस फाइट में गामा ने रहीम को बहुत बुरी तरह से परास्त कर दिया और इस जीत के साथ ही गामा के नाम के सामने रुस्तम-ए-हिंद का सम्मान जुड़ गया। आखिरकार 1927 में गामा ने आखिरी फाइट लड़ी और उन्होंने स्वीडन के पहलवान जेस पीटरसन को हराकर खामोशी से इस खेल को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। 1947 में भारत पाकिस्तान बटवारे के बाद गामा पाकिस्तान में बस गए और वहीं पर लंबी बीमारी झेलते हुए 1963 में उनकी मृत्यु हो गई।

बॉडी बिल्डिंग के लिए आजकल के समय में भले ही बहुत सारी मशीनें आ रही हैं, लेकिन गामा पहलवान ने पत्थरों से बनाए हुए डंबल, असली और गोला के प्रयोग से अपनी बॉडी बनाई थी और उनके द्वारा काम किया जाने वाला सामान आज भी पटियाला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स म्यूजियम में सुरक्षित रखा गया है।